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शादी चढ़ी दहेज की बलि

याद है मुझे वह दिन जब लड़के वाले मुझे देखने आए थे।काफी खुश थी मैं और होती भी क्यों ना, लड़का जो अमीर घर से था।इस बात का मुझे बहुत गुमान था कि सभी सहेलियों में से मेरी ही शादी बड़े घर में हो रही है।और सबसे बड़ी बात के लड़के वाले कोई दहेज नहीं मांग रहे थे।

परंतु फिर भी मेरे परिवार वाले अपनी हैसियत के हिसाब से दहेज देना चाहते थे।जैसे ही मेरे पिताजी ने मेरे होने वाले ससुर के सामने दहेज देने की इच्छा रखी।तो वह तुरंत बोल पड़े, “जी भाई साहब! क्यों नहीं, आखिर आप जो भी देंगे आपकी बेटी के ही काम आएगा ना”।

इस बात पर मैं और मेरा पूरा परिवार भी खुशी से सहमत हो गए।कुछ दिनों बाद पिताजी ने पंडित को बुलाया और हमारी सगाई का मुहूर्त भी निकलवा लिया।पंडित जी ने भाद्रपद मास की चतुर्थी तिथि को सगाई के लिए फाइनल कर दिया।

मैं खुशी खुशी अपनी सगाई की तैयारियों में जुट गई और आखिर मेरी सगाई का शुभ दिन भी आ ही गया।मेरे ससुराल वालों की तरफ से मेरे लिए खूब महंगी महंगी साड़ी और जेवर मुझे गिफ्ट में मिले।लेकिन मेरे पिताजी ने मेरे होने वाले पति के लिए सिर्फ सोने की चेन ही बनवाई थी।परंतु हम उस सोने की चैन में भी खुश थे क्योंकि लड़के वालों की तरफ से कोई डिमांड नहीं थी।

जैसे ही सगाई की रस्में पूरी हुई और मेहमानों के जाने का समय हुआ।तो मेरे ससुर ने मेरे पिताजी को इशारा करके अलग बुलाया।

मुझे लगा शायद वे शादी के बारे में कुछ बातें करना चाहते होंगे।लेकिन जब मेरे पिताजी कमरे से बाहर निकले तो उनका चेहरा लटका हुआ था।मैं समझ नहीं पा रही थी कि आखिर अचानक से ऐसा क्या हो गया।मैं उस समय चाह कर भी अपने पिताजी से बात नहीं कर पाई।

लेकिन मेरे पिताजी, मेहमानों को अलविदा कहते हुए उन्हें 5-5 हजार रुपए दे रहे थे।मुझे थोड़ा अजीब लगा कि मेरे पिताजी ने मुझे इस बारे में कोई बात ही नहीं बताई।लेकिन मेरे मन में यह बात जरूर खनकी कि कहीं मेरे ससुर ने इस बात के लिए मेरे पिताजी पर दबाव तो नहीं बनाया है।मेहमानों के जाते ही मैंने अपने पिताजी से इस विषय में पूछा।

तो उन्होंने कहा, “बेटा यह सब मैंने इसलिए ही किया ताकि ससुराल में तुम्हारा मान सम्मान बढ़ सके”।हालांकि उस समय तो मुझे भी यह बात बहुत अच्छी लगी कि ससुराल में सब मेरा सम्मान करेंगे।अगले ही महीने हमारी शादी भी तय हो गई और वह दिन भी आ गया जब मैं शादी करके अपने ससुराल पहुंची।पर ससुराल पहुंचते ही मुझे मान सम्मान की बजाए तानों का सामना करना पड़ा।

अपने आस-पड़ोस की महिलाओं से परिचय कराते हुए मेरी सास ने कहा “यह तो छोटे घर की है, इसलिए इसके बाप ने कुछ नहीं दिया”।हालांकि मेरे पिताजी ने अपनी हैसियत के हिसाब से 15 लाख रुपए की नकदी मेरे ससुराल वालों को दी थी।उस दिन के बाद घर में आने वाले हर मेहमान के सामने  मुझे जलील किया जाने लगा।मैं चाह कर भी इस बारे में अपने पिताजी से बात नहीं कर पाई।

आखिरकार मैंने अपनी जीवन लीला समाप्त करने का फैसला कर ही लिया परंतु मैं फिर से बच गई।किंतु मुझे इतना एहसास जरूर हुआ कि मेरे गुमान और पिताजी की चुप्पी की वजह से ही आज मेरा जीवन नर्क बन गया है।आखिर कब तक दहेज के लिए होता रहेगा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न। इसी सवाल के साथ अब तक मेरी सांसे चल रही है। शादी चढ़ी दहेज की बलि

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